Last updated: October 3rd, 2026 at 02:09 pm

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में साइबर ठगी का एक बड़ा मामला सामने आया है। जार्जटाउन क्षेत्र में रहने वाली एक महिला डॉक्टर को साइबर अपराधियों ने कथित तौर पर करीब एक महीने तक डिजिटल अरेस्ट के नाम पर डराए रखा और उनसे लगभग 1.78 करोड़ रुपये अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर करा लिए। महिला डॉक्टर को उनके नाम से ड्रग्स वाला पार्सल आने और मोबाइल नंबर का आपराधिक गतिविधियों में इस्तेमाल होने की बात कहकर डराया गया था। मामले की जानकारी सामने आने के बाद साइबर क्राइम थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है।
पुलिस के अनुसार, महिला डॉक्टर को करीब एक महीने पहले एक अनजान नंबर से फोन आया था। फोन करने वाले ने खुद को कोरियर कंपनी का कर्मचारी बताया और कहा कि उनके नाम पर एक पार्सल आया है। कथित तौर पर बताया गया कि पार्सल में ड्रग्स और अन्य संवेदनशील सामान मौजूद है। इसके बाद कॉल को एक ऐसे व्यक्ति से जोड़ दिया गया जिसने खुद को पुलिस अधिकारी बताया।
आरोप है कि इसके बाद साइबर अपराधियों ने अलग-अलग सरकारी एजेंसियों के अधिकारी बनकर महिला डॉक्टर से संपर्क किया। उन्होंने गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई का डर दिखाया तथा मामले की जांच के नाम पर महिला डॉक्टर को लगातार अपने संपर्क में रहने के लिए मजबूर किया। इसी दौरान उनसे बैंकिंग और अन्य निजी जानकारी हासिल की गई।
रिपोर्ट के मुताबिक, साइबर अपराधियों ने बातचीत के लिए सिग्नल एप का इस्तेमाल किया। महिला डॉक्टर के मोबाइल में भी यह एप डाउनलोड करवाया गया। इसके बाद कभी वीडियो कॉल और कभी इंटरनेट कॉल के जरिए उनसे संपर्क किया जाता रहा। लगातार डर और दबाव का माहौल बनाकर उन्हें यह विश्वास दिलाने की कोशिश की गई कि यदि उन्होंने कथित जांच में सहयोग नहीं किया तो उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
इसी दौरान महिला डॉक्टर ने अलग-अलग बैंक खातों में रकम भेजनी शुरू कर दी। रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने बैंक जाकर आरटीजीएस के माध्यम से भी पैसे ट्रांसफर किए। कई चरणों में भेजी गई रकम कुल मिलाकर करीब 1.78 करोड़ रुपये बताई गई है। साइबर अपराधियों की ओर से रकम की मांग लगातार जारी रहने के बाद महिला डॉक्टर को संदेह हुआ। बाद में उन्होंने एक परिचित से इस बारे में बातचीत की, जिसके बाद उन्हें पता चला कि वह साइबर ठगी का शिकार हो चुकी हैं।
इसके बाद महिला डॉक्टर ने साइबर पुलिस से संपर्क किया और पूरे मामले की जानकारी दी। उनकी शिकायत के आधार पर साइबर क्राइम थाने में मामला दर्ज किया गया है। पुलिस अब उन बैंक खातों की जांच कर रही है जिनमें रकम भेजी गई थी। जांच का एक प्रमुख हिस्सा यह पता लगाना है कि पैसे किन खातों में पहुंचे और वहां से रकम को आगे किन खातों में ट्रांसफर किया गया।
पुलिस के अनुसार, आरोपियों की पहचान के लिए बैंक लेनदेन और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की जांच की जा रही है। कॉल रिकॉर्ड, इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबर और ऑनलाइन बातचीत से जुड़े विवरण भी जांच का हिस्सा हो सकते हैं। फिलहाल पुलिस ने आरोपियों की पहचान और गिरफ्तारी को लेकर अंतिम जानकारी सार्वजनिक नहीं की है।
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर होने वाली साइबर ठगी में अपराधी अक्सर पुलिस, सीबीआई, ईडी, कस्टम या अन्य सरकारी संस्थाओं का अधिकारी बनकर लोगों से संपर्क करते हैं। वे कथित जांच, गिरफ्तारी या किसी आपराधिक मामले का डर दिखाकर पीड़ित को लगातार फोन या वीडियो कॉल पर बनाए रखने की कोशिश करते हैं। प्रयागराज के मामले में भी अलग-अलग सरकारी एजेंसियों के अधिकारी बनने का आरोप सामने आया है।
इस तरह के मामलों में यह समझना महत्वपूर्ण है कि किसी व्यक्ति को फोन या वीडियो कॉल के जरिए वास्तविक रूप से “डिजिटल अरेस्ट” करने की कोई सामान्य कानूनी प्रक्रिया नहीं है। अगर कोई व्यक्ति पुलिस या किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बनकर फोन पर गिरफ्तारी का डर दिखाते हुए पैसे मांगता है, तो बिना सत्यापन रकम ट्रांसफर नहीं करनी चाहिए। संदिग्ध कॉल की जानकारी संबंधित साइबर अपराध हेल्पलाइन और पुलिस को दी जा सकती है।
प्रयागराज के इस मामले में साइबर पुलिस अब ठगी की पूरी रकम के लेनदेन और आरोपियों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है। महिला डॉक्टर से करीब 1.78 करोड़ रुपये की ठगी का आरोप है, लेकिन मामले की पूरी सच्चाई जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी। फिलहाल पुलिस ने शिकायत के आधार पर मुकदमा दर्ज कर डिजिटल और बैंकिंग साक्ष्यों की जांच शुरू कर दी है।
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