Last updated: November 1st, 2026 at 03:23 pm

बिहार की राजनीति में 31 अक्टूबर और 1 नवंबर को एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया, जिसने सत्तारूढ़ एनडीए और विपक्ष के बीच नई बहस छेड़ दी है। हाल ही में विधान परिषद का चुनाव जीतने वाले दो निर्दलीय विधान पार्षद बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली भाजपा और एनडीए सरकार को समर्थन देने की घोषणा की। हालांकि, दोनों के भाजपा में औपचारिक रूप से शामिल होने को लेकर बाद में स्थिति बदल गई।
शनिवार को दोनों नेता पटना स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय पहुंचे थे। यहां उन्होंने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात की। भाजपा विधानमंडल दल की बैठक में भी उनकी मौजूदगी रही। शुरुआत में दोनों नेताओं की भाजपा में सदस्यता लेने की खबर सामने आई और पार्टी कार्यालय से उनकी तस्वीरें भी सामने आईं। इन तस्वीरों में दोनों नेताओं के हाथों में सदस्यता से जुड़ी पर्चियां दिखाई देने की बात कही गई।
बंशीधर ब्रजवासी तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से लगातार दूसरी बार निर्दलीय चुनाव जीतकर विधान परिषद पहुंचे हैं। उन्होंने जदयू उम्मीदवार अभिषेक झा को हराया था। वहीं राहुल राज ने सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से जदयू के आनंद पुष्कर को पराजित कर जीत दर्ज की। दोनों की जीत इसलिए भी चर्चा में रही क्योंकि उन्होंने एनडीए के घटक दल जदयू के उम्मीदवारों को हराया था।
हालांकि, भाजपा में शामिल होने की खबरों के बाद मामला नया मोड़ ले गया। बंशीधर ब्रजवासी ने वीडियो जारी कर कहा कि उन्होंने भाजपा की सदस्यता नहीं ली है। उनके मुताबिक, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने उन्हें शिक्षकों की समस्याओं पर बातचीत के लिए बुलाया था। मुलाकात के दौरान शिक्षक हितों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई और अधिकारियों के साथ बैठक कराने का आश्वासन दिया गया। ब्रजवासी ने कहा कि वह शिक्षकों के मुद्दों पर पहले की तरह आवाज उठाते रहेंगे और सरकार ने समस्याओं का समाधान नहीं किया तो उसका विरोध भी करेंगे।
दूसरी ओर, राहुल राज ने पहले मीडिया से बातचीत में भाजपा की सदस्यता लेने की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि वह पहले भी भाजपा से जुड़े रहे हैं और मुख्यमंत्री के नेतृत्व में विश्वास रखते हैं। हालांकि, बाद में भाजपा की ओर से दोनों नेताओं के औपचारिक रूप से पार्टी में शामिल होने के दावे से पीछे हटते हुए कहा गया कि उन्होंने केवल सरकार और पार्टी को समर्थन दिया है।
इस घटनाक्रम पर राष्ट्रीय जनता दल ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने दोनों निर्दलीय विधान पार्षदों की सदस्यता रद्द करने की मांग उठाई। उनका कहना है कि निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता लेना संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल कानून का उल्लंघन है।
जन सुराज की ओर से भी इस मामले को विधान परिषद के सभापति और अन्य कानूनी मंचों पर उठाने की बात कही गई है। संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा 2(2) के अनुसार, निर्दलीय निर्वाचित सदस्य चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है तो उसकी सदस्यता पर अयोग्यता का प्रावधान लागू हो सकता है। ऐसे मामलों में अंतिम फैसला संबंधित सदन के सभापति को करना होता है।
इस विवाद का असर एनडीए के भीतर भी दिखाई दे रहा है। जदयू उम्मीदवारों को हराकर जीते दोनों नेताओं के भाजपा के साथ आने से गठबंधन की चुनावी राजनीति और आपसी तालमेल पर सवाल उठे हैं। फिलहाल भाजपा ने इसे समर्थन का मामला बताया है, जबकि विपक्ष इसे दल-बदल कानून से जोड़ रहा है।
अब इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम बात यह होगी कि दोनों नेताओं की औपचारिक राजनीतिक स्थिति क्या रहती है और सदस्यता को लेकर कोई आधिकारिक शिकायत दाखिल होने पर विधान परिषद के सभापति क्या निर्णय लेते हैं। बिहार की राजनीति में यह मामला आने वाले दिनों में भी चर्चा का विषय बना रह सकता है।
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