Last updated: November 5th, 2026 at 02:28 pm

दिल्ली में लगातार बिगड़ती वायु गुणवत्ता के बीच सरकार ने प्रदूषण से निपटने के लिए कृत्रिम बारिश की तकनीक यानी क्लाउड सीडिंग पर एक बार फिर काम तेज कर दिया है। राजधानी में पिछले 15 दिनों के दौरान इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे (IGI Airport) के आसपास क्लाउड सीडिंग के दो परीक्षण किए गए हैं। इन परीक्षणों का उद्देश्य यह समझना है कि मौजूदा मौसम और बादलों की परिस्थितियों में कृत्रिम बारिश कराने की तकनीक कितनी कारगर हो सकती है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, दिवाली और छठ पर्व के बाद इस दिशा में कुछ और परीक्षण किए जा सकते हैं।
दिल्ली में नवंबर की शुरुआत से ही प्रदूषण का स्तर चिंताजनक बना हुआ है। कई इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) बेहद खराब से गंभीर श्रेणी के करीब पहुंच रहा है। सर्दियों की शुरुआत, कम हवा की गति, वाहनों से निकलने वाला धुआं, निर्माण गतिविधियों की धूल, औद्योगिक उत्सर्जन और पड़ोसी राज्यों में पराली जलाने की घटनाएं प्रदूषण को बढ़ा रही हैं। दिवाली के दौरान पटाखों से निकलने वाला धुआं भी स्थिति को और खराब कर सकता है। ऐसे में सरकार प्रदूषण के स्तर को अस्थायी रूप से कम करने के लिए कृत्रिम बारिश को एक संभावित उपाय के रूप में देख रही है।
सूत्रों के मुताबिक, हाल में किए गए दोनों परीक्षण दिल्ली एयरपोर्ट के आसपास किए गए। इन प्रयोगों की एक खास बात यह रही कि इन्हें लगभग 30,000 मीटर की ऊंचाई पर संचालित किया गया। पिछले साल दिल्ली में हुए क्लाउड सीडिंग अभियानों के दौरान लगभग 10,000 मीटर की ऊंचाई का इस्तेमाल किया गया था। इस बार अधिक ऊंचाई पर परीक्षण करने के पीछे मौसम संबंधी परिस्थितियों और बादलों की प्रतिक्रिया को समझना एक महत्वपूर्ण उद्देश्य माना जा रहा है। हालांकि, परीक्षणों के विस्तृत नतीजों की आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है।
सरकारी सूत्रों का कहना है कि दिवाली और छठ के बाद दो से तीन तारीखों पर आगे के प्रयोग किए जाने की संभावना है। छठ पर्व को भी संभावित समय के रूप में देखा जा रहा है। फिलहाल सरकार की ओर से इन प्रस्तावित अभियानों की तारीखों की आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली सरकार दिवाली से पहले इन गतिविधियों की औपचारिक पुष्टि करने से बच रही है।
क्लाउड सीडिंग एक मौसम संशोधन तकनीक है, जिसके जरिए उपयुक्त बादलों में विशेष पदार्थों को फैलाकर बारिश की संभावना बढ़ाने की कोशिश की जाती है। इस प्रक्रिया में सिल्वर आयोडाइड, सोडियम क्लोराइड और कुछ अन्य पदार्थों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इन पदार्थों के सूक्ष्म कण बादलों में मौजूद जलवाष्प को संघनित होने या बर्फ के क्रिस्टल बनाने में मदद करते हैं। अनुकूल तापमान, पर्याप्त नमी और उपयुक्त बादल मौजूद होने पर पानी की बूंदें बड़ी होकर बारिश के रूप में गिर सकती हैं।
कृत्रिम बारिश होने पर हवा में मौजूद धूल और प्रदूषण के कुछ कण पानी के साथ नीचे आ सकते हैं। इससे PM2.5 और PM10 जैसे प्रदूषकों के स्तर में अस्थायी कमी आने की संभावना रहती है। हालांकि, क्लाउड सीडिंग से बारिश की गारंटी नहीं होती। यदि वातावरण में पर्याप्त नमी नहीं है या बादल अनुकूल नहीं हैं, तो प्रयोग सफल नहीं हो सकता। इसलिए इस तकनीक का इस्तेमाल करने से पहले मौसम वैज्ञानिकों को बादलों, हवा की दिशा, तापमान और नमी का आकलन करना पड़ता है।
दिल्ली सरकार ने पिछले साल भी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर के सहयोग से क्लाउड सीडिंग का प्रयोग किया था। इसके लिए दिल्ली के पर्यावरण विभाग और IIT कानपुर के बीच 25 सितंबर 2025 को समझौता हुआ था। अक्टूबर 2025 में दो चरणों में परीक्षण किए गए थे। प्रत्येक अभियान में सिल्वर आयोडाइड और सोडियम क्लोराइड वाले आठ रासायनिक फ्लेयर्स का इस्तेमाल किया गया था। हालांकि, उन प्रयोगों से बारिश नहीं हो पाई थी। बाद में दिल्ली सरकार की ओर से जारी रिपोर्ट में दावा किया गया था कि बारिश न होने के बावजूद लक्षित क्षेत्रों में पार्टिकुलेट मैटर के स्तर में कुछ कमी दर्ज की गई थी।
विशेषज्ञों के अनुसार, कृत्रिम बारिश को दिल्ली के प्रदूषण का स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता। इससे अनुकूल मौसम में कुछ समय के लिए राहत मिल सकती है, लेकिन प्रदूषण के मूल कारणों पर लगातार काम करना जरूरी है। वाहनों के उत्सर्जन को नियंत्रित करना, सार्वजनिक परिवहन को मजबूत बनाना, निर्माण स्थलों पर धूल रोकना, औद्योगिक प्रदूषण की निगरानी और पराली जलाने की घटनाओं को कम करना दीर्घकालिक उपायों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
दिल्ली में किए गए हालिया परीक्षणों के बाद अब यह देखना होगा कि दिवाली और छठ के बाद सरकार आगे के प्रयोगों को मंजूरी देती है या नहीं। यदि मौसम अनुकूल रहा और तकनीक सफल हुई, तो राजधानी को कुछ समय के लिए प्रदूषण से राहत मिल सकती है। हालांकि, अंतिम सफलता बादलों में नमी और वातावरण की वास्तविक परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।
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