Last updated: April 27th, 2026 at 06:46 am

अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली आम आदमी पार्टी इस समय बड़े संगठनात्मक संकट का सामना कर रही है। पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों के पाला बदलने के बाद न केवल राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हुई है, बल्कि कार्यकर्ताओं के मनोबल पर भी इसका गहरा असर पड़ा है।
पार्टी पहले ही फरवरी 2025 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद अपने संगठन को मजबूत करने की कोशिश कर रही थी। इसी बीच वरिष्ठ नेताओं के इस तरह पार्टी छोड़ने से हालात और चुनौतीपूर्ण हो गए हैं।
सूत्रों के मुताबिक, सांसदों के जाने का असर जमीनी स्तर तक दिखाई दे रहा है। कई कार्यकर्ता असमंजस की स्थिति में हैं और यह आशंका जताई जा रही है कि बड़ी संख्या में कार्यकर्ता भी अपने पसंदीदा नेताओं के साथ दूसरी पार्टियों का रुख कर सकते हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह केवल नेताओं का पार्टी छोड़ना नहीं, बल्कि संगठन के भीतर विश्वास के संकट का संकेत है। इससे पार्टी की एकजुटता और अनुशासन की छवि को भी नुकसान पहुंच सकता है।
पार्टी नेतृत्व के सामने अब दोहरी चुनौती है—एक ओर संगठन में टूट को रोकना और दूसरी ओर कार्यकर्ताओं के गिरते मनोबल को फिर से संभालना। अगर जल्द ही कोई ठोस रणनीति नहीं अपनाई गई, तो इसका असर आने वाले चुनावों में भी देखने को मिल सकता है।
फिलहाल, आम आदमी पार्टी एक अहम मोड़ पर खड़ी है, जहां उसे अपने संगठन को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं में भरोसा बहाल करने के लिए बड़े फैसले लेने की जरूरत है। आने वाला समय तय करेगा कि पार्टी इस संकट से कैसे बाहर निकलती है।
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