Last updated: August 8th, 2026 at 03:42 pm

चर्चित भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में नया विवाद सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव कुमार सिंह ने भरत तिवारी के परिवार से मुलाकात के बाद पुलिस कार्रवाई को लेकर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। हालांकि, ये सभी दावे अधिवक्ता की ओर से किए गए हैं और मामले की जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया में इनके सत्यापन की स्थिति महत्वपूर्ण होगी।
15 जून से साजिश का दावा
संजीव कुमार सिंह के मुताबिक, 17 जून 2026 को हुई कार्रवाई अचानक नहीं हुई थी। उन्होंने दावा किया कि इसकी तैयारी दो दिन पहले शुरू हो गई थी। उनका आरोप है कि 16 जून को तत्कालीन शाहपुर एसडीपीओ की ओर से पुलिस मुख्यालय को एक रिपोर्ट भेजी गई, जिसके बाद एसटीएफ की टीम भोजपुर पहुंची।
अधिवक्ता का दावा है कि रिपोर्ट में इलाके में गंभीर हिंसक घटना की आशंका जताई गई थी, जबकि वास्तविक स्थिति ऐसी नहीं थी। इसी रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई की पूरी योजना बनाए जाने का उन्होंने आरोप लगाया।
एसटीएफ के पहले पहुंचने का दावा
अधिवक्ता के अनुसार, एसटीएफ की टीम 16 जून को ही बिलौटी गांव पहुंच गई थी। उन्होंने दावा किया कि घटना वाले दिन भरत तिवारी ने फेसबुक लाइव के जरिए आत्मसमर्पण की इच्छा जताई थी, लेकिन इसके बावजूद उसके खिलाफ गोलीबारी की गई। उन्होंने आरोप लगाया कि शुरुआती फायरिंग के बाद भी भरत तिवारी जीवित था और बाद में वाहन के भीतर भी गोली चलाई गई। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस वक्त उपलब्ध नहीं है।
बैलिस्टिक रिपोर्ट को बताया अहम
संजीव कुमार सिंह ने दावा किया कि बैलिस्टिक जांच में अलग-अलग हथियारों से गोली चलाए जाने के संकेत मिले हैं। उनके मुताबिक, फॉरेंसिक और पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी मामले की जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। उन्होंने फेसबुक लाइव वीडियो, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, बैलिस्टिक रिपोर्ट और पुलिस अधिकारियों के कॉल डिटेल रिकॉर्ड को भी संभावित महत्वपूर्ण साक्ष्य बताया है।
राष्ट्रपति सचिवालय में शिकायत का जिक्र
अधिवक्ता ने बताया कि उन्होंने मामले को लेकर राष्ट्रपति सचिवालय को भी शिकायत भेजी थी। उनके अनुसार, शिकायत के बाद बिहार के मुख्य सचिव को आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे। उन्होंने दावा किया कि इसके बाद आंतरिक स्तर पर जांच हुई और एसटीएफ के एक जवान की गिरफ्तारी समेत अन्य कार्रवाई की गई।
कथित 1400 करोड़ के मामले से जोड़ा
संजीव कुमार सिंह ने भरत तिवारी को जवइनिया गांव के विस्थापितों से जुड़े करीब 1,400 करोड़ रुपये के कथित घोटाले से भी जोड़ा। उनका आरोप है कि इस मामले से जुड़े तथ्यों को सामने लाने के कारण भरत तिवारी को निशाना बनाया गया। हालांकि, इस दावे के समर्थन में अधिवक्ता ने सार्वजनिक रूप से कोई दस्तावेज पेश नहीं किया है। इसलिए इस आरोप की पुष्टि जांच और संबंधित दस्तावेजों के आधार पर ही हो सकेगी।
आरोपी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की तैयारी
अधिवक्ता ने बताया कि मामले में नामजद पुलिसकर्मियों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट हासिल करने के लिए आरा कोर्ट में कानूनी प्रक्रिया शुरू की गई है। उन्होंने यह भी कहा कि एफआईआर में नाम नहीं होने वाले कथित साजिशकर्ताओं के खिलाफ भी कानूनी कदम उठाने की तैयारी है। उन्होंने कहा कि परिवार को न्याय दिलाना उनकी प्राथमिकता है और मामले में दोष साबित होने पर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी सजा की मांग की जाएगी।
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