Last updated: April 22nd, 2026 at 09:40 am

बिहार में राजस्व कर्मचारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई को लेकर सरकार के रुख में अचानक बदलाव ने सियासी और प्रशासनिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। पहले हड़ताली कर्मचारियों पर सख्ती दिखाते हुए निलंबन का आदेश जारी किया गया, लेकिन कुछ ही दिनों बाद इस फैसले को वापस लेने से कई सवाल खड़े हो गए हैं।
दरअसल, 13 अप्रैल को राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने राज्य के सभी जिलाधिकारियों को पत्र लिखकर हड़ताल पर गए कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का निर्देश दिया था। इसके बाद विभिन्न जिलों में बड़ी संख्या में कर्मचारियों को निलंबित भी किया गया।
हालांकि, नई सरकार के गठन और सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के कुछ दिनों बाद ही इस फैसले में बदलाव देखने को मिला। 19 अप्रैल को विभाग की ओर से नया निर्देश जारी कर निलंबन वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई।
सरकार का कहना है कि यह फैसला प्रशासनिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। खासकर आगामी जनगणना कार्य में राजस्व कर्मचारियों की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए यह कदम उठाया गया। विभाग ने यह भी स्पष्ट किया कि नियमों के अनुसार निलंबन और उसकी वापसी का अधिकार जिलाधिकारियों के पास होता है।
इस पूरे मामले में पूर्व उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा की भूमिका को लेकर भी स्थिति साफ करने की कोशिश की गई है। विभाग ने कहा कि कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई में उनकी कोई सीधी भूमिका नहीं थी, बल्कि यह निर्णय प्रशासनिक स्तर पर लिया गया था।
गौरतलब है कि पिछले कई महीनों से राजस्व कर्मचारी हड़ताल पर थे, जिससे जमीन से जुड़े कार्य प्रभावित हो रहे थे। उस दौरान भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान भी चर्चा में था, जिसके बीच कर्मचारियों की हड़ताल ने हालात और जटिल बना दिए थे।
अब निलंबन वापस लेने के फैसले के बाद विपक्ष और आम जनता के बीच कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि इस तरह के यू-टर्न से सरकार की नीतियों और प्रशासनिक फैसलों की स्थिरता पर सवाल खड़े होते हैं।
फिलहाल, सरकार अपने फैसले को व्यावहारिक जरूरत बता रही है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने बिहार की प्रशासनिक कार्यशैली और राजनीतिक समीकरणों को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है।
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