Last updated: October 18th, 2026 at 10:30 am

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने कानून के विद्यार्थियों से अपील की है कि वे अपने पेशेवर जीवन में नैतिकता, स्वतंत्र सोच और न्याय के मूल्यों से समझौता न करें। उन्होंने कहा कि कानूनी शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ किताबों और अदालती फैसलों की जानकारी देना नहीं, बल्कि छात्रों को न्याय बनाए रखने, स्वतंत्रता की रक्षा करने और आम लोगों की सेवा करने के लिए तैयार करना भी है।
जस्टिस सूर्यकांत शनिवार को बेंगलुरु स्थित नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (NLSIU) के 34वें वार्षिक दीक्षांत समारोह में शामिल हुए। कार्यक्रम का आयोजन पैलेस रोड स्थित ज्ञान ज्योति ऑडिटोरियम में किया गया। अपने संबोधन में उन्होंने स्नातक होने वाले विद्यार्थियों को कानून के पेशे से जुड़ी जिम्मेदारियों और नैतिक मूल्यों के बारे में महत्वपूर्ण संदेश दिया।
कानून के पेशे में नैतिकता और साहस जरूरी
CJI सूर्यकांत ने कहा कि NLSIU को ‘पूर्व का हार्वर्ड’ कहा जाता है। ऐसे प्रतिष्ठित संस्थान से शिक्षा हासिल करने वाले विद्यार्थियों के साथ बड़ी उम्मीदें और जिम्मेदारियां भी जुड़ी होती हैं।
समाचार एजेंसी IANS के मुताबिक, उन्होंने जोर दिया कि कानून के पेशे में नैतिक जिम्मेदारी, बौद्धिक स्वतंत्रता, साहस और दूसरों की बात सुनने की क्षमता बेहद जरूरी है। खासकर उन लोगों की आवाज को समझना आवश्यक है, जिन्हें अक्सर अपनी बात रखने का अवसर नहीं मिल पाता।
उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले दूसरे पक्ष को ध्यान से सुनें। किसी व्यक्ति और उसके पद के बीच अंतर समझें और असहमति जताते समय भी दूसरे की गरिमा का सम्मान करें।
कानून को बताया ‘जीवंत संवाद’
अपने संबोधन में जस्टिस सूर्यकांत ने कानून को एक जीवंत संवाद के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि कानून स्थिर नहीं रहता, बल्कि उसे लागू करने और उसकी व्याख्या करने वालों के विचारों तथा कार्यों से लगातार विकसित होता है।
उन्होंने बताया कि वकीलों की दलीलें, अनुबंध, कानूनी सलाह और अदालतों के फैसले मिलकर न्याय की व्यापक व्यवस्था तैयार करते हैं। अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि, विचारों और मान्यताओं वाले लोगों से संवाद करना भी कानूनी पेशे का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
उनके मुताबिक, विभिन्न दृष्टिकोणों को समझने और उन्हें उचित स्थान देने से न्याय की बेहतर व्यवस्था विकसित करने में मदद मिलती है।
शॉर्टकट के बजाय संस्थान के मूल्यों पर चलने की सलाह
CJI ने स्नातकों को आगाह किया कि करियर में ऐसे मौके आ सकते हैं, जब उनके सामने समझौता करने या आसान रास्ता चुनने का विकल्प होगा। ऐसे समय में उन्हें संस्थान से मिले मूल्यों और सिद्धांतों पर कायम रहना चाहिए।
उन्होंने कानून के सफर की तुलना एक नदी से की, जो प्राचीन ज्ञान के स्रोतों से निकलती है और कानूनी मिसालों तथा सिद्धांतों से गुजरते हुए आगे बढ़ती है। यह नदी अंततः कानूनी पेशे के विशाल और अनिश्चित समुद्र में मिल जाती है।
दिवंगत पूर्व छात्रा को दी श्रद्धांजलि
दीक्षांत समारोह के दौरान जस्टिस सूर्यकांत ने विश्वविद्यालय की एक दिवंगत पूर्व छात्रा को श्रद्धांजलि दी और उनके परिवार तथा मित्रों के प्रति संवेदना व्यक्त की। उन्होंने विद्यार्थियों की सफलता में माता-पिता के त्याग के साथ-साथ शिक्षकों और कर्मचारियों के योगदान की भी सराहना की।
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने स्नातकों से ‘उम्मीद के अग्रदूत’ बनने की अपील की। उन्होंने कहा कि विद्यार्थी अपने करियर में आगे बढ़ें, समाज के लिए सार्थक योगदान दें और राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाएं।
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