Last updated: November 7th, 2026 at 05:53 am

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले बहुजन समाज पार्टी ने अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ानी शुरू कर दी है। पार्टी प्रमुख मायावती 6 दिसंबर को लखनऊ में एक बड़ी रैली करने जा रही हैं। खास बात यह है कि इस रैली के लिए बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस का दिन चुना गया है। कार्यक्रम का आयोजन डॉ. भीमराव अंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल पर होगा।
इस रैली के जरिए मायावती अपने समर्थकों को एकजुट करने के साथ-साथ पार्टी की राजनीतिक ताकत दिखाने की तैयारी में हैं। इसे 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बसपा के चुनावी अभियान की महत्वपूर्ण शुरुआत माना जा रहा है। पार्टी की कोशिश दलितों के साथ पिछड़े, मुस्लिम और दूसरे सामाजिक वर्गों के बीच अपना जनाधार मजबूत करने की है।
अखिलेश के PDA फॉर्मूले को चुनौती देने की तैयारी
दरअसल, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण के जरिए अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटे हैं। ऐसे में मायावती की प्रस्तावित रैली को इस सामाजिक समीकरण के मुकाबले बसपा की अपनी राजनीतिक रणनीति पेश करने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है।
बसपा का जोर ‘वोट हमारा, राज भी हमारा’ के नारे के जरिए समर्थकों को एकजुट करने पर है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा और प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल आयोजन स्थल का निरीक्षण भी कर चुके हैं। मायावती की रणनीति बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने और चुनाव में मजबूत उम्मीदवार उतारने की भी है।
2007 वाला सियासी समीकरण दोहराने की कोशिश
बसपा इस बार सिर्फ दलित मतदाताओं तक सीमित नहीं रहना चाहती। पार्टी की नजर ब्राह्मण, पिछड़े, मुस्लिम और युवा मतदाताओं पर भी है। इसके लिए 2007 के सोशल इंजीनियरिंग मॉडल को फिर से मजबूत करने की कोशिश की जा रही है। उस चुनाव में मायावती ने बहुजन से सर्वजन का नारा दिया था और बसपा ने 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी।
इसके अलावा बेरोजगारी, पेपर लीक, भ्रष्टाचार और गरीबी जैसे मुद्दों के जरिए युवाओं को जोड़ने की रणनीति पर भी काम हो रहा है। पार्टी में आकाश आनंद और ईशान आनंद की बढ़ती भूमिका को भी इसी तैयारी से जोड़कर देखा जा रहा है।
लगातार गिरते जनाधार को वापस पाना बड़ी चुनौती
हालांकि, मायावती के सामने सबसे बड़ी चुनौती बसपा का खोया हुआ राजनीतिक आधार वापस लाने की है। आंकड़ों पर नजर डालें तो 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने 80 सीटें जीती थीं, जो 2017 में घटकर 19 रह गईं। वहीं 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी केवल एक सीट पर सिमट गई थी।
वोट प्रतिशत में भी गिरावट दर्ज की गई। 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा को 12.88 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में उसका वोट शेयर घटकर 9.39 प्रतिशत रह गया।
ऐसे में 6 दिसंबर की लखनऊ रैली मायावती और बसपा के लिए काफी अहम मानी जा रही है। अब देखना होगा कि इस रैली के जरिए मायावती अपने पुराने समर्थकों को कितना एकजुट कर पाती हैं और 2027 के चुनाव से पहले पार्टी को नई राजनीतिक दिशा देने में कितनी सफल होती हैं।
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