Last updated: October 8th, 2026 at 11:36 am

दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर के निधन की खबर से फिल्म जगत में शोक की लहर है। 75 वर्षीय अभिनेता का 8 अक्टूबर को गोवा स्थित उनके घर पर कार्डियक अरेस्ट के बाद निधन हुआ। उनके अंतिम संस्कार को राजकीय सम्मान के साथ किए जाने की घोषणा भी की गई है।
नाना पाटेकर अपनी दमदार अदाकारी के साथ-साथ बेबाक विचारों के लिए भी जाने जाते थे। उनकी निजी मान्यताओं को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन धर्म और जाति को लेकर अभिनेता का नजरिया काफी स्पष्ट था।
नाना पाटेकर धर्म को लेकर क्या सोचते थे?
नाना पाटेकर का जन्म महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में हुआ था और उनका मूल नाम विश्वनाथ पाटेकर था। वह मराठी हिंदू परिवार से आते थे। हालांकि, सार्वजनिक रूप से धर्म और जाति को लेकर उनके विचार किसी एक पहचान तक सीमित नहीं रहे।
अभिनेता कई मौकों पर यह बात कह चुके थे कि इंसान की पहचान उसकी जाति या धर्म से ऊपर होनी चाहिए। वह खुद को सबसे पहले भारतीय मानने और इंसानियत को सबसे महत्वपूर्ण मानने की बात करते थे।
जाति और धर्म के कॉलम पर भी उठाया था सवाल
नाना पाटेकर ने एक कार्यक्रम के दौरान फॉर्म में जाति और धर्म से जुड़े कॉलम को लेकर भी सवाल उठाया था। उनका तर्क था कि लोगों को उनकी जाति या धर्म के आधार पर अलग-अलग देखने के बजाय भारतीय के तौर पर देखा जाना चाहिए।
आरक्षण को लेकर भी उन्होंने आर्थिक आधार पर विचार रखने की बात कही थी। उनके ये विचार उस दौर में चर्चा में रहे थे और उनके सामाजिक नजरिए को सामने रखते थे।
फिल्मों के साथ सामाजिक काम में भी सक्रिय रहे नाना
नाना पाटेकर ने हिंदी और मराठी सिनेमा के अलावा थिएटर में भी अपनी अलग पहचान बनाई। ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अब तक छप्पन’, ‘वेलकम’ और ‘नटसम्राट’ जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को खूब सराहा गया। उन्हें तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिले थे।
अभिनेता सामाजिक कार्यों से भी जुड़े रहे। उन्होंने मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर नाम फाउंडेशन की स्थापना की थी, जो किसानों और सूखा प्रभावित परिवारों की मदद के लिए काम करता है।
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