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री-NEET में बायोमेट्रिक सिस्टम से छेड़छाड़ का खुलासा, बिहार में 30 आरोपी गिरफ्तार; जांच के घेरे में ठेका कंपनी

बिहार में आयोजित NEET-UG पुनर्परीक्षा के दौरान सामने आए बड़े फर्जीवाड़े ने परीक्षा सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर
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बिहार में आयोजित NEET-UG पुनर्परीक्षा के दौरान सामने आए बड़े फर्जीवाड़े ने परीक्षा सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लखीसराय में सॉल्वर गैंग के भंडाफोड़ के बाद पुलिस ने अब तक 30 लोगों को गिरफ्तार किया है। इनमें बायोमेट्रिक सत्यापन से जुड़ी कंपनी के तीन सुपरवाइजर और 14 कर्मचारी भी शामिल हैं। जांच में पता चला है कि गिरोह ने असली अभ्यर्थियों की जगह प्रशिक्षित सॉल्वर्स को परीक्षा में बैठाने के लिए बायोमेट्रिक प्रक्रिया में ही हेरफेर की थी।

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    ब्लैकलिस्टेड कंपनी तक पहुंची जांच

    जानकारी के अनुसार, राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) ने री-NEET परीक्षा के लिए बायोमेट्रिक सत्यापन का जिम्मा एजुकेशनल कंसल्टेंट्स इंडिया लिमिटेड (EDCIL) को सौंपा था। बाद में यह काम इनोवेटिव व्यू नामक कंपनी को दिया गया। जांच एजेंसियां अब इस कंपनी की भूमिका की भी पड़ताल कर रही हैं। बताया जा रहा है कि यह कंपनी पहले कई राज्यों में विवादों के कारण ब्लैकलिस्ट की जा चुकी है।

    ऐसे काम करता था पूरा नेटवर्क

    पुलिस जांच में सामने आया है कि एडमिट कार्ड जारी होने के बाद ही गिरोह ने बायोमेट्रिक कर्मचारियों से संपर्क साध लिया था। असली उम्मीदवारों का बायोमेट्रिक सत्यापन परीक्षा केंद्र से दूर वाहनों में कराया जाता था, जबकि उनकी जगह दूसरे लोग परीक्षा हॉल में प्रवेश करते थे। बाद में पहचान छिपाने के लिए फर्जी परीक्षार्थियों के अंगूठे के निशानों से भी छेड़छाड़ की जाती थी।

    गुप्त सूचना से खुला मामला

    21 जून को पुलिस और एनटीए को एक गुप्त ईमेल मिला, जिसमें एक अभ्यर्थी की जगह दूसरी छात्रा द्वारा परीक्षा देने की जानकारी दी गई थी। इसके बाद लखीसराय में छापेमारी की गई और कई लोगों को हिरासत में लिया गया। जांच आगे बढ़ने पर पूरे रैकेट का खुलासा हुआ।

    मेडिकल छात्रों की भूमिका भी सामने आई

    जांच में पता चला है कि इस नेटवर्क में कई मेडिकल कॉलेजों के छात्र और इंटर्न भी शामिल थे। पुलिस के अनुसार, मुख्य आरोपियों में एक पीएमसीएच का एमबीबीएस छात्र भी शामिल है, जिसने फर्जी पहचान के जरिए परीक्षा केंद्र में प्रवेश कर सॉल्वर्स की मदद की। मामले में कई अन्य राज्यों के मेडिकल छात्रों के नाम भी सामने आए हैं।

    लाखों रुपये में होती थी डील

    पुलिस के मुताबिक, एक अभ्यर्थी को परीक्षा पास कराने के लिए 60 लाख रुपये तक की डील की जाती थी। इसमें अलग-अलग लोगों को उनकी भूमिका के अनुसार रकम दी जाती थी। फिलहाल पुलिस और केंद्रीय एजेंसियां बायोमेट्रिक डेटा, कंपनी के अधिकारियों और पूरे नेटवर्क की गहन जांच कर रही हैं।

    अधिकारियों का मानना है कि आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़े खुलासे हो सकते हैं। यह मामला एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में सुरक्षा व्यवस्था और आउटसोर्सिंग प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर रहा है।

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