Last updated: September 1st, 2026 at 02:54 pm

बिहार और झारखंड के बीच सोन नदी के पानी के बंटवारे को लेकर करीब 25 साल से चला आ रहा विवाद अब खत्म हो गया है। दोनों राज्यों ने सोमवार को नई दिल्ली में सोन नदी के जल बंटवारे को लेकर एक समझौता ज्ञापन यानी MoU पर हस्ताक्षर किए। समझौते पर बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने हस्ताक्षर किए। इस दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल समेत दोनों राज्यों के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।
सोन नदी के पानी को लेकर बिहार और झारखंड के बीच विवाद वर्ष 2000 में झारखंड के बिहार से अलग राज्य बनने के बाद शुरू हुआ था। इससे पहले 1973 में बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच सोन नदी के पानी तथा बाणसागर परियोजना से जुड़े जल बंटवारे को लेकर समझौता हुआ था। झारखंड के गठन के बाद राज्य ने अपने क्षेत्र में सोन नदी के जलग्रहण क्षेत्र और पानी की जरूरतों को देखते हुए अधिक हिस्सेदारी की मांग की थी। इसके बाद दोनों राज्यों के बीच लंबे समय तक सहमति नहीं बन पाई।
अब हुए नए समझौते के तहत बिहार को सोन नदी से 5.75 मिलियन एकड़-फीट (MAF) पानी और झारखंड को 2 MAF पानी का कानूनी हिस्सा मिलेगा। इस समझौते से दोनों राज्यों में सिंचाई और पेयजल की उपलब्धता बढ़ाने का रास्ता साफ होने की उम्मीद है। Economic Times के अनुसार, बिहार को मिलने वाला 5.75 MAF पानी उसके मौजूदा उपयोग से अधिक है, जबकि झारखंड को पहली बार इस व्यवस्था के तहत 2 MAF का स्पष्ट कानूनी हिस्सा मिला है।
समझौते का सीधा असर बिहार के दक्षिणी और मध्य हिस्सों के कई जिलों पर पड़ने की उम्मीद है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार भोजपुर, बक्सर, रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद, अरवल, गया और पटना जिलों में बड़ी आबादी को सिंचाई और पेयजल के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध कराने में यह समझौता मदद करेगा। झारखंड के पलामू, गढ़वा और आसपास के क्षेत्रों में भी सिंचाई तथा पेयजल की उपलब्धता बेहतर होने की उम्मीद है।
सोन नदी बिहार के दक्षिणी हिस्से की कृषि व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। खासकर रोहतास, भोजपुर, बक्सर और कैमूर जैसे क्षेत्रों में सोन नहर प्रणाली का इस्तेमाल लंबे समय से कृषि सिंचाई के लिए किया जाता रहा है। पानी की उपलब्धता में कमी का असर खरीफ और रबी दोनों मौसम की खेती पर पड़ सकता है। नए समझौते से बिहार में सोन नहर प्रणाली को पर्याप्त पानी मिलने की उम्मीद है, जिससे किसानों को फायदा हो सकता है।
समझौते का एक महत्वपूर्ण पहलू इंद्रपुरी बैराज और जलाशय व्यवस्था से भी जुड़ा है। Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, समझौते के बाद इंद्रपुरी बैराज की पूरी क्षमता से संचालन का रास्ता साफ हो सकता है। यह बैराज सोन नहर नेटवर्क के लिए प्रमुख जल-वितरण संरचना है और दक्षिण बिहार के बड़े कृषि क्षेत्र को सिंचाई उपलब्ध कराने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
झारखंड के लिए यह समझौता पलामू और गढ़वा जैसे अपेक्षाकृत सूखे क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाओं के विस्तार की संभावना पैदा करता है। नए जल स्रोत और नहर नेटवर्क विकसित होने से इन क्षेत्रों में कृषि गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है। इसके अलावा समझौते के तहत जलाशयों में पानी के स्तर और भूमि डूबने से जुड़े मुद्दों को भी ध्यान में रखा गया है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने समझौते को अंतरराज्यीय सहयोग और सहकारी संघवाद का उदाहरण बताया। गृह मंत्रालय के अनुसार, इससे बिहार और झारखंड के बड़े ग्रामीण क्षेत्रों में लाखों किसानों को सिंचाई का लाभ मिलने के साथ लोगों को पेयजल उपलब्ध कराने में भी मदद मिलेगी। केंद्र सरकार ने इसे इस वर्ष राज्यों के बीच हुए कई महत्वपूर्ण जल समझौतों की श्रृंखला का हिस्सा बताया है।
यह समझौता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लंबे समय से चले आ रहे जल विवाद अक्सर राज्यों के बीच विकास परियोजनाओं में बाधा बनते रहे हैं। सोन नदी विवाद के समाधान से दोनों राज्यों के बीच जल संसाधन प्रबंधन को लेकर सहयोग बढ़ने की संभावना है। साथ ही भविष्य में सिंचाई, जलाशय और नहर से जुड़ी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है।
अब इस समझौते को जमीन पर लागू करना दोनों राज्यों के लिए अगली बड़ी चुनौती होगी। पानी के वास्तविक वितरण, जलाशयों के संचालन, नहरों के विस्तार और किसानों तक पर्याप्त पानी पहुंचाने के लिए दोनों सरकारों के बीच लगातार समन्वय आवश्यक होगा। यदि समझौते के प्रावधान प्रभावी ढंग से लागू होते हैं तो इसका असर बिहार और झारखंड के कृषि क्षेत्रों के साथ-साथ ग्रामीण पेयजल व्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
बिहार और झारखंड ने सोन नदी के पानी के बंटवारे को लेकर करीब 25 साल से चले आ रहे विवाद को खत्म करते हुए नई दिल्ली में MoU पर हस्ताक्षर किए हैं। समझौते के तहत बिहार को 5.75 MAF और झारखंड को 2 MAF पानी का हिस्सा मिलेगा। इससे बिहार के कई जिलों और झारखंड के पलामू-गढ़वा क्षेत्रों में सिंचाई और पेयजल व्यवस्था बेहतर होने की उम्मीद है।
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