Last updated: July 14th, 2026 at 01:10 pm

प्रस्तावित भ्रष्टाचार-रोधी विधेयकों को लेकर विपक्ष की ओर से उठाए जा रहे सवालों के बीच केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अपना पक्ष स्पष्ट किया है। मंत्रालय ने कहा है कि इन विधेयकों का उद्देश्य किसी भी गैर-बीजेपी सरकार को अस्थिर करना या देश के संघीय ढांचे को कमजोर करना नहीं है, बल्कि शासन व्यवस्था को अधिक जवाबदेह और प्रभावी बनाना है।
गृह मंत्रालय ने यह स्पष्टीकरण संसद की संयुक्त समिति (JPC) को दिया, जो इन प्रस्तावित कानूनों की समीक्षा कर रही है। मंत्रालय का कहना है कि यदि कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री गंभीर आपराधिक मामले में लगातार 30 दिनों तक न्यायिक हिरासत में रहता है, तो उसे कार्यकारी पद छोड़ना होगा। हालांकि, उसकी विधानसभा या संसद की सदस्यता स्वतः समाप्त नहीं होगी।
सरकार की स्थिरता पर नहीं पड़ेगा असर
मंत्रालय के अनुसार, किसी मंत्री या मुख्यमंत्री के पद छोड़ने की स्थिति में संबंधित दल या गठबंधन अपने किसी अन्य निर्वाचित सदस्य को नया नेता चुन सकता है। ऐसे में सरकार का बहुमत और लोकतांत्रिक जनादेश प्रभावित नहीं होगा।
गृह मंत्रालय ने कहा कि यह व्यवस्था प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखने और यह सुनिश्चित करने के लिए प्रस्तावित की गई है कि लंबे समय तक हिरासत में रहने वाला व्यक्ति कार्यकारी जिम्मेदारियों का निर्वहन न कर पाने की स्थिति में भी पद पर बना न रहे।
विपक्ष की आपत्तियों पर दिया जवाब
विपक्षी दलों ने इन प्रस्तावित प्रावधानों को संघवाद और लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ बताते हुए आशंका जताई थी कि इनका इस्तेमाल विपक्ष शासित राज्यों की सरकारों को कमजोर करने के लिए किया जा सकता है।
इस पर गृह मंत्रालय ने कहा कि संविधान में पहले से ही जवाबदेही के कई प्रावधान मौजूद हैं और नेतृत्व परिवर्तन लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। इसलिए इन विधेयकों से जनता के जनादेश पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
मानसून सत्र में पेश हो सकती है रिपोर्ट
बीजेपी सांसद अपराजिता सारंगी की अध्यक्षता वाली संयुक्त संसदीय समिति (JPC) इन विधेयकों पर अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में है। संभावना है कि समिति अपनी रिपोर्ट संसद के आगामी मानसून सत्र के दौरान लोकसभा में पेश करेगी।
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