Last updated: September 6th, 2026 at 02:53 pm

राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता और बिहार के पूर्व विधायक रीतलाल यादव को संगठित अपराध और रंगदारी से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट से फिलहाल जमानत नहीं मिली है। शीर्ष अदालत ने पटना हाईकोर्ट के जमानत से इनकार करने वाले फैसले में दखल देने से मना कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने भविष्य में दोबारा जमानत मांगने की संभावना खुली रखी है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
3 सितंबर को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने मामले की सुनवाई की। रीतलाल यादव की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल जमानत देने से इनकार करते हुए ट्रायल कोर्ट को मामले में आरोप तय करने की प्रक्रिया जल्द पूरी करने के निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि मौजूदा चरण में पटना हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने का पर्याप्त आधार नहीं है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण विकल्प भी दिया है। अदालत के मुताबिक आरोप तय होने के बाद यदि अगले एक साल के भीतर मुकदमे की सुनवाई में कोई ठोस प्रगति नहीं होती है और रीतलाल यादव ट्रायल में पूरा सहयोग करते हैं, तो वह दोबारा पटना हाईकोर्ट में जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं।
फरवरी में हाईकोर्ट ने भी खारिज की थी याचिका
इससे पहले 26 फरवरी को पटना हाईकोर्ट ने रीतलाल यादव की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 111(4), 111(6) और 111(7) के तहत दर्ज संगठित अपराध से जुड़े आरोपों का है।
जांच एजेंसियों के अनुसार, रीतलाल यादव पर कथित रूप से संगठित गिरोह से जुड़े होने के आरोप हैं। एजेंसी का आरोप है कि गिरोह रियल एस्टेट कारोबारियों और अन्य व्यवसायियों से धमकी देकर रंगदारी मांगता था। इसके अलावा आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति अर्जित करने का आरोप भी मामले में शामिल है।
कई आपराधिक मामलों में नाम आने का दावा
रीतलाल यादव राजद के प्रमुख नेताओं में रहे हैं और दानापुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक भी रह चुके हैं। उनके खिलाफ पहले भी कई आपराधिक मामलों का उल्लेख सामने आता रहा है। हालांकि, मौजूदा मामले में लगाए गए आरोप अभी न्यायिक प्रक्रिया के अधीन हैं। आरोपों पर अंतिम फैसला ट्रायल पूरा होने और अदालत के निर्णय के बाद ही होगा।
अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद फिलहाल रीतलाल यादव को जमानत नहीं मिली है। अब मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोप तय किए जाने और उसके बाद मुकदमे की प्रगति पर नजर रहेगी। यदि अदालत द्वारा तय शर्तों के मुताबिक एक साल के भीतर सुनवाई में पर्याप्त प्रगति नहीं होती और रीतलाल यादव ट्रायल में सहयोग करते हैं, तो वे फिर से पटना हाईकोर्ट का रुख कर सकते हैं।
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