Last updated: September 23rd, 2026 at 10:22 am

भारत के चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी के बीच मतभेद अब सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गए हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 10 महीनों में संधू और जोशी ने आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज की। इन आपत्तियों में नए मतदाताओं के पंजीकरण, वोटर डेटा, आधिकारिक संचार, अधिकारियों के काम के बंटवारे और पश्चिम बंगाल में वोटर डिलीशन से जुड़ी प्रक्रियाएं शामिल हैं।
14 आपत्तियों में क्या-क्या मुद्दे उठे?
रिपोर्ट के अनुसार, पहली आपत्ति 28 अक्टूबर 2025 को सुखबीर सिंह संधू ने दर्ज की। इसमें आयोग की मंजूरी के बिना ECI के नाम से पत्र और आदेश जारी किए जाने पर सवाल उठाया गया था।
इसके बाद 16 अप्रैल 2026 को संधू ने नए IT मॉड्यूल और पोर्टल के बारे में आयोग के सदस्यों को मीडिया से जानकारी मिलने और बिना आयोग की मंजूरी आधिकारिक संचार जारी किए जाने पर आपत्ति जताई। इसी दिन विवेक जोशी ने आयोग की बैठकों के एजेंडे और मिनट्स से जुड़ी जानकारी समय पर उपलब्ध नहीं होने तथा अधिकारियों के विदेश दौरों के लिए आयोग की मंजूरी से जुड़े सवाल उठाए।
24 अप्रैल को जोशी ने आधिकारिक संचार को लेकर फिर आपत्ति दर्ज की। 16 मई को उन्होंने Form-6 में बदलाव को लेकर सवाल उठाया, जबकि 29 मई को वोटर रोल डेटाबेस के केंद्रीकरण और उसके ऑडिट की जरूरत का मुद्दा उठाया। बाद में संधू ने भी इस चिंता का समर्थन किया।
जुलाई के अंत में दोनों आयुक्तों ने अधिकारियों के काम के पुनर्वितरण को लेकर कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र लिखे। 30 जुलाई को दोनों ने नए आवंटन आदेश को खारिज कर दिया।
अगस्त में भी मतभेद जारी रहे। संधू ने पश्चिम बंगाल में ECI की ओर से दाखिल की गई अपीलों की अनुमति और प्रक्रिया पर सवाल उठाया। इसके अलावा Form-6 में बदलाव को लेकर उन्होंने इसे “अनधिकृत और अवैध” बताते हुए हटाने की मांग की। ECI के IT सिस्टम तक फील्ड अधिकारियों की पहुंच को लेकर भी उन्होंने आपत्ति दर्ज की।
सबसे बड़ा विवाद Form-6 को लेकर
विवाद का एक प्रमुख हिस्सा नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में किए गए बदलाव से जुड़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक, फॉर्म में यह जानकारी मांगी गई कि आवेदक, उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली SIR की वोटर लिस्ट में मौजूद था या नहीं।
विवेक जोशी ने मई में इस बदलाव पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि Form-6 एक वैधानिक फॉर्म है और इसमें बदलाव के लिए Registration of Electors Rules, 1960 में संशोधन जरूरी है। 19 मई को संधू ने भी इस राय का समर्थन किया। बाद में 13 अगस्त को संधू ने बदलाव को “अनधिकृत और अवैध” बताते हुए इसे हटाने की मांग की।
ECINet और वोटर डेटा के केंद्रीकरण पर सवाल
दूसरा बड़ा मुद्दा चुनावी डेटा के डिजिटल सिस्टम ECINet से जुड़ा है। दोनों चुनाव आयुक्तों ने वोटर रोल डेटाबेस के धीरे-धीरे दिल्ली में केंद्रीकृत होने को लेकर चिंता जताई।
जोशी ने डेटाबेस की सुरक्षा और एक्सेस का ऑडिट कराने की जरूरत बताई। उनका सवाल था कि संबंधित वैधानिक अधिकारियों के अलावा किसी अन्य व्यक्ति के पास वोटर डेटाबेस में बदलाव करने की पहुंच नहीं होनी चाहिए।
अगस्त में संधू ने भी कहा कि राज्य स्तर के अधिकारियों को ERONet तक उचित और पूर्ण पहुंच नहीं मिल रही है। उन्होंने IT व्यवस्था के जरिए वैधानिक अधिकारियों की भूमिका सीमित होने पर सवाल उठाया।
पश्चिम बंगाल में वोटर डिलीशन की अपीलों पर भी सवाल
पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान हटाए गए मतदाताओं से जुड़ी अपीलों की प्रक्रिया भी विवाद का एक हिस्सा बनी। संधू ने अगस्त में पूछा कि ECI की ओर से उन मतदाताओं के खिलाफ अपील दाखिल करने की अनुमति किसने दी, जिन्हें न्यायिक अधिकारियों ने वोटर लिस्ट में शामिल करने का फैसला किया था।
उन्होंने यह भी दर्ज किया कि उन्हें, विवेक जोशी और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को अपील दाखिल करने की प्रक्रिया और उसके आधार की जानकारी नहीं थी।
कानून में क्या व्यवस्था है?
भारत का चुनाव आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत काम करता है। आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त शामिल होते हैं। Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023 की धारा 18 के अनुसार आयोग का काम जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से किया जाना चाहिए। यदि सदस्यों के बीच मतभेद हो तो मामला बहुमत की राय के आधार पर तय किया जाता है।
चुनाव आयोग का पक्ष क्या है?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, आयोग ने अपने स्तर पर यह कहा है कि SIR समेत सभी महत्वपूर्ण फैसले सर्वसम्मति से लिए गए और लागू किए गए हैं। आयोग का कहना है कि कामकाज के दौरान अलग-अलग राय होना सामान्य है, लेकिन अंतिम निर्णय आयोग की सामूहिक प्रक्रिया के तहत लिया जाता है। रिपोर्ट में आयोग से इन आपत्तियों पर विस्तृत सवाल पूछे जाने का भी उल्लेख है।
वहीं, विपक्षी दलों ने रिपोर्ट सामने आने के बाद चुनाव आयोग और CEC ज्ञानेश कुमार पर सवाल उठाए हैं। इन नेताओं की प्रतिक्रियाएं उनके राजनीतिक दावों और आरोपों के रूप में देखी जानी चाहिए; वे स्वयं आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों के तथ्य से अलग हैं।
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