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दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, नाबालिग पत्नी के मामले में निजी कानून का हवाला देकर POCSO से राहत नहीं

  दिल्ली हाईकोर्ट ने नाबालिग पत्नी से यौन संबंध के एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि
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    दिल्ली हाईकोर्ट ने नाबालिग पत्नी से यौन संबंध के एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की के मामले में व्यक्तिगत कानून का हवाला देकर POCSO और अन्य आपराधिक कानूनों से छूट नहीं ली जा सकती। अदालत ने 16 वर्षीय लड़की से विवाह करने वाले एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज POCSO मामले को खत्म करने से इनकार कर दिया।

     

    मामला एक ऐसे दंपती से जुड़ा था, जिनका विवाह दिसंबर 2024 में हुआ था। उस समय लड़की की उम्र करीब 16 वर्ष और तीन महीने थी, जबकि व्यक्ति की उम्र लगभग 28 वर्ष थी। बाद में लड़की गर्भवती हुई और मई 2026 में करीब आठ महीने की गर्भावस्था के दौरान सरकारी अस्पताल पहुंची। अस्पताल में उसकी उम्र सामने आने के बाद पुलिस को सूचना दी गई और मामले में FIR दर्ज हुई।

     

    FIR में भारतीय न्याय संहिता और POCSO Act की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था। इसके बाद आरोपी ने हाईकोर्ट का रुख करते हुए FIR को रद्द करने की मांग की। उसकी ओर से दलील दी गई कि विवाह मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के तहत हुआ था और लड़की की सहमति से संबंध बने थे। याचिका में यह भी कहा गया कि विवाह के बाद दोनों साथ रह रहे थे।

     

    अदालत ने व्यक्तिगत कानून और आपराधिक कानून के बीच अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि व्यक्तिगत कानून विवाह की स्थिति और उससे जुड़े नागरिक परिणामों को निर्धारित कर सकता है, लेकिन वह ऐसे आपराधिक कानून में अपवाद नहीं बना सकता जहां संसद ने कोई अपवाद निर्धारित नहीं किया है।

     

    POCSO Act के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को बच्चा माना जाता है। अदालत ने कहा कि कानून में निर्धारित उम्र के मामले में नाबालिग की सहमति को ऐसा आधार नहीं माना जा सकता जिससे आपराधिक प्रावधान लागू न हों। अदालत के अनुसार, विवाह होने से किसी बच्चे की कानूनी उम्र नहीं बदल जाती।

     

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह इस मामले में विवाह की वैधता पर अंतिम निर्णय नहीं दे रही थी। उसका मुख्य सवाल यह था कि यदि लड़की 18 वर्ष से कम उम्र की थी, तो क्या विवाह या व्यक्तिगत कानून का हवाला देकर POCSO के तहत दर्ज आपराधिक मामले को समाप्त किया जा सकता है। अदालत ने इस आधार पर FIR रद्द करने से इनकार कर दिया।

     

    मामले में यह भी सामने आया कि गर्भावस्था के दौरान लड़की अस्पताल पहुंची थी। बाद में गर्भ में बच्चे की मौत हुई और जून 2026 में लड़की ने मृत बच्चे को जन्म दिया। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, सबूत जुटाने और DNA जांच के लिए बच्चे के शव को निकालने की अनुमति भी ली गई थी।

     

    अदालत ने यह तर्क भी स्वीकार नहीं किया कि लड़की ने खुद पुलिस में शिकायत नहीं की थी। अदालत के सामने यह तथ्य रखा गया कि अस्पताल के अधिकारियों को उसकी उम्र का पता चलने के बाद कानून के तहत रिपोर्टिंग की प्रक्रिया शुरू हुई। POCSO कानून में बच्चों से जुड़े यौन अपराधों की जानकारी मिलने पर रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी तय की गई है।

     

    हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि विवाह को आधार बनाकर नाबालिग के साथ यौन संबंध के मामलों में आपराधिक कानून से छूट दी जाती है, तो बच्चों की कानूनी सुरक्षा उम्र के बजाय इस बात पर निर्भर करने लगेगी कि उनका विवाह हुआ है या नहीं। अदालत ने इसी कारण व्यक्तिगत कानून को POCSO के लिए स्वतः अपवाद मानने से इनकार किया।

     

    इस फैसले के बाद यह बात स्पष्ट हुई है कि 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति से जुड़े यौन अपराधों में POCSO Act की कानूनी सुरक्षा महत्वपूर्ण रहेगी। अदालत ने संबंधित मामले में आरोपी को मुकदमे का सामना करने से राहत नहीं दी और FIR रद्द करने की याचिका खारिज कर दी।

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