Last updated: October 27th, 2026 at 03:28 pm
उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐसे मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिसमें एक कर्मचारी करीब तीन दशक तक अदालत के अंतरिम आदेश के कारण नौकरी करता रहा। अदालत ने वर्ष 1995 में उसकी सेवा समाप्त करने के सरकारी आदेश को बरकरार रखते हुए याचिका खारिज कर दी। कर्मचारी का तर्क था कि वह स्थायी पद पर काम कर रहा था, इसलिए उसकी सेवा समाप्त करने से पहले उसे सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए था। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी स्थायी पद पर काम करना और कर्मचारी का नियमित या स्थायी सेवा में पुष्टि प्राप्त करना दो अलग-अलग बातें हैं।
यह मामला रविंद्र पाल सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य से संबंधित है। रविंद्र पाल सिंह को वर्ष 1991 में इटावा स्थित राजकीय मूक-बधिर बालिका विद्यालय में कनिष्ठ लिपिक यानी जूनियर क्लर्क के पद पर नियुक्त किया गया था। उनकी नियुक्ति अस्थायी और तदर्थ प्रकृति की थी। नियुक्ति की शर्तों के अनुसार उनकी सेवाएं निर्धारित नियमों के तहत समाप्त की जा सकती थीं। बाद में राज्य सरकार ने 29 सितंबर 1995 को उनकी सेवा समाप्त करने का आदेश जारी कर दिया।
सरकारी आदेश के खिलाफ कर्मचारी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मुकदमे की सुनवाई के दौरान अदालत से अंतरिम राहत मिलने के कारण वह काम करता रहा। इस अंतरिम आदेश के तहत उसे वेतन मिलता रहा और इस तरह मामला लंबे समय तक न्यायिक प्रक्रिया में बना रहा। लगभग 30 वर्ष बाद हाईकोर्ट ने मामले पर अंतिम निर्णय सुनाते हुए मूल बर्खास्तगी आदेश को वैध माना।
कर्मचारी की ओर से दलील दी गई कि जिस पद पर उसकी नियुक्ति हुई थी, वह स्थायी पद था। इसलिए उसे सामान्य अस्थायी कर्मचारी की तरह मानकर सेवा समाप्त नहीं की जा सकती थी। उसका कहना था कि सेवा समाप्त करने से पहले उसे सुनवाई का उचित अवसर दिया जाना चाहिए था और सरकारी कार्रवाई में कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी था।
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने उत्तर प्रदेश अस्थायी सरकारी सेवक सेवा समाप्ति नियमावली, 1975 और उत्तर प्रदेश राज्य सरकारी सेवक पुष्टिकरण नियमावली, 1991 के प्रावधानों पर विचार किया। अदालत के अनुसार, किसी स्थायी पद पर अस्थायी या तदर्थ आधार पर काम करने वाला कर्मचारी केवल इस कारण नियमित कर्मचारी नहीं बन जाता कि वह लंबे समय से उस पद पर कार्यरत है। कर्मचारी की सेवा की स्थिति और नियमित नियुक्ति की पुष्टि संबंधित नियमों तथा औपचारिक आदेशों से तय होती है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कर्मचारी की सेवा समाप्त करने का आदेश दंडात्मक कार्रवाई के रूप में जारी नहीं किया गया था। इसे लागू सेवा नियमों के तहत सामान्य सेवा समाप्ति माना गया। ऐसे मामले में, यदि आदेश दंड के रूप में नहीं है और नियमों के अनुरूप जारी किया गया है, तो प्रत्येक परिस्थिति में विभागीय जांच या सुनवाई अनिवार्य नहीं होती। इसी आधार पर अदालत ने माना कि कर्मचारी को सुनवाई का अवसर न दिए जाने से आदेश अपने आप अवैध नहीं हो जाता।
हाईकोर्ट ने कर्मचारी की याचिका खारिज करते हुए 29 सितंबर 1995 के सेवा समाप्ति आदेश को बरकरार रखा। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि अंतरिम आदेश के कारण कर्मचारी को पहले जो वेतन दिया गया था, उसकी वसूली राज्य सरकार उससे नहीं करेगी। इस निर्देश का उद्देश्य लंबे समय तक लागू रहे न्यायिक आदेश के तहत किए गए भुगतान को वापस लेने से रोकना था।
इस फैसले का सरकारी कर्मचारियों और नियुक्ति संबंधी विवादों के संदर्भ में विशेष महत्व है। अदालत ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि किसी पद का स्थायी होना और उस पर नियुक्त व्यक्ति का स्थायी कर्मचारी होना समान नहीं है। तदर्थ नियुक्ति, नियमित नियुक्ति और सेवा की पुष्टि के बीच कानूनी अंतर होता है। केवल लंबे समय तक नौकरी करने से कर्मचारी को स्वतः स्थायी दर्जा नहीं मिल जाता।
मामला यह भी दिखाता है कि अदालत से मिली अंतरिम राहत अंतिम फैसले की गारंटी नहीं होती। किसी कर्मचारी को मुकदमे के दौरान काम जारी रखने की अनुमति मिल सकती है, लेकिन अंतिम निर्णय में मूल सरकारी आदेश को वैध ठहराया जा सकता है। इस मामले में भी लगभग तीन दशक तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद हाईकोर्ट ने मूल सेवा समाप्ति आदेश को सही माना और कर्मचारी की याचिका खारिज कर दी।
![]()
Comments are off for this post.