Last updated: September 6th, 2026 at 03:31 pm

बिहार में गैर-वित्तपोषित शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों की मांग को लेकर कांग्रेस ने पटना में ‘कफन मार्च’ निकाला। प्रदर्शन के जरिए पार्टी ने राज्य सरकार से इन शिक्षकों को नियमित वेतनमान देने और उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार करने की मांग की। कांग्रेस का आरोप है कि लंबे समय से इन संस्थानों में काम कर रहे शिक्षकों को स्थायी और पर्याप्त वेतन व्यवस्था का लाभ नहीं मिल रहा है, जिसके कारण उन्हें आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
यह मार्च शनिवार को पटना में आयोजित किया गया। प्रदर्शन में कांग्रेस के सेवा दल से जुड़े कार्यकर्ताओं और पार्टी नेताओं ने हिस्सा लिया। प्रदर्शनकारियों ने राज्य की गैर-वित्तपोषित शिक्षा नीति और मौजूदा अनुदान आधारित व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाई। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि जिन शिक्षकों ने वर्षों तक विद्यार्थियों को पढ़ाने का काम किया है, उनके लिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे उन्हें नियमित और सम्मानजनक आय मिल सके।
‘कफन मार्च’ नाम से किए गए इस प्रदर्शन के जरिए कांग्रेस ने सरकार पर शिक्षा क्षेत्र से जुड़े कर्मचारियों की समस्याओं को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया। पार्टी का कहना है कि गैर-वित्तपोषित संस्थानों के शिक्षक लंबे समय से नियमित वेतनमान की मांग कर रहे हैं। कांग्रेस ने सरकार से उनकी मांगों पर तत्काल विचार करने और ऐसी नीति तैयार करने की अपील की है जिससे शिक्षकों को हर महीने स्थिर आय मिल सके।
गैर-वित्तपोषित शिक्षण संस्थानों की व्यवस्था में शिक्षकों को मिलने वाला आर्थिक सहयोग नियमित सरकारी वेतन से अलग होता है। कांग्रेस का आरोप है कि अनुदान आधारित व्यवस्था के कारण शिक्षकों की आय में स्थिरता नहीं रहती। पार्टी ने इसी व्यवस्था में बदलाव की मांग करते हुए नियमित वेतनमान लागू करने की मांग उठाई है। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए केवल सरकारी स्कूलों और शिक्षकों पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन संस्थानों में काम करने वाले शिक्षकों की समस्याओं का भी समाधान जरूरी है।
कांग्रेस नेताओं ने प्रदर्शन के दौरान राज्य सरकार की शिक्षा नीति पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि शिक्षक विद्यार्थियों की शिक्षा और भविष्य निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, इसलिए उन्हें आर्थिक सुरक्षा मिलनी चाहिए। पार्टी ने सरकार से शिक्षकों की मांगों पर बातचीत करने और उनके लिए व्यावहारिक समाधान निकालने की अपील की।
इस प्रदर्शन को बिहार की राजनीति में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि राज्य में शिक्षा और शिक्षक भर्ती पहले से ही प्रमुख राजनीतिक मुद्दे बने हुए हैं। सरकारी स्कूलों में शिक्षक भर्ती, वेतन और सेवा शर्तों को लेकर लगातार राजनीतिक बहस होती रही है। ऐसे में गैर-वित्तपोषित संस्थानों के शिक्षकों के नियमित वेतनमान की मांग को लेकर कांग्रेस का सड़क पर उतरना सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
कांग्रेस ने कहा कि शिक्षकों की समस्याओं को केवल राजनीतिक मुद्दे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। पार्टी के मुताबिक यह हजारों शिक्षकों और उनके परिवारों की आजीविका से जुड़ा विषय है। नियमित वेतनमान मिलने से शिक्षकों को आर्थिक स्थिरता हासिल हो सकती है और वे बिना वित्तीय चिंता के अपने शिक्षण कार्य पर अधिक ध्यान दे सकेंगे।
प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने सरकार से गैर-वित्तपोषित शिक्षण संस्थानों की स्थिति की समीक्षा करने और शिक्षकों के लिए स्पष्ट वेतन नीति बनाने की मांग की। पार्टी ने संकेत दिया कि यदि उनकी मांगों पर सरकार की ओर से ठोस कदम नहीं उठाया गया तो आने वाले समय में आंदोलन को और व्यापक किया जा सकता है।
सरकार की ओर से इस प्रदर्शन और नियमित वेतनमान की मांग पर किसी बड़े फैसले की जानकारी सामने नहीं आई है। कांग्रेस के इस मार्च ने एक बार फिर बिहार में गैर-वित्तपोषित संस्थानों के शिक्षकों की आर्थिक स्थिति और राज्य की शिक्षा नीति को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि सरकार इन शिक्षकों की मांगों पर क्या रुख अपनाती है और क्या उनके लिए नियमित वेतनमान को लेकर कोई नई व्यवस्था तैयार की जाती है।
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