Last updated: November 5th, 2026 at 12:04 pm

बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने निर्वाचन आयोग (ECI) को निर्देश दिया है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए छह लोगों के नाम दोबारा शामिल किए जाएं। इनमें परेश सालगांवकर और उनके परिवार के पांच सदस्य शामिल हैं। अदालत ने पते का सत्यापन करने के बाद 10 दिनों के भीतर नाम बहाल करने का आदेश दिया है।
गुरुवार को जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस और जस्टिस अमित जामसांडेकर की खंडपीठ ने चार दिनों तक चली सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ताओं ने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने और पता बदलने के लिए जमा किए गए फॉर्म-8 को खारिज किए जाने को चुनौती दी थी।
पते में बदलाव के बाद वोटर लिस्ट से हटे नाम
मामला गोवा के सांता क्रूज विधानसभा क्षेत्र का है। परेश सालगांवकर और उनके परिवार के सदस्यों ने पता बदलने के लिए फॉर्म-8 जमा किया था। इसके बावजूद SIR प्रक्रिया के दौरान उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए।
हाईकोर्ट ने निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि संबंधित पते का सत्यापन कर छहों मतदाताओं के नाम 10 दिनों के भीतर बहाल किए जाएं।
चुनाव आयोग ने याचिका खारिज करने की मांग की थी
सुनवाई के दौरान निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का हवाला देते हुए हाईकोर्ट से इस मामले की कार्यवाही स्थगित रखने का अनुरोध किया था। आयोग का तर्क था कि गोवा में दाखिल याचिका SIR की पूरी प्रक्रिया और मतदाताओं के नाम हटाने से जुड़ी है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने आयोग की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि मौजूदा याचिका पूरी SIR प्रक्रिया को चुनौती नहीं देती, बल्कि कुछ मतदाताओं के नाम हटाए जाने और फॉर्म-8 खारिज किए जाने से संबंधित है।
ऑटोमेटिक सिस्टम पर भी उठाए सवाल
‘बार एंड बेंच’ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने निर्वाचन आयोग की स्वचालित प्रणाली पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि पता बदलने के बाद ऑटोमेटिक सिस्टम के जरिए मतदाता का नाम सीधे सूची से हट जाना गंभीर चिंता का विषय है।
खंडपीठ ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि मतदाताओं से पुराने पते के लिए गणना फॉर्म पर हस्ताक्षर करवाने की प्रक्रिया उन्हें गलत घोषणा करने की स्थिति में डाल सकती है। वहीं, फॉर्म-8 खारिज होने के बाद कुछ मतदाताओं को फॉर्म-6 भरना पड़ता है, जिसमें उनके सामने यह घोषित करने की समस्या आती है कि वे किसी दूसरी जगह पहले से पंजीकृत नहीं हैं।
नाम हटाने से पहले सुनवाई का मौका देना जरूरी
हाईकोर्ट ने जोर दिया कि मतदाता सूची से किसी व्यक्ति का नाम हटाने से पहले उसे अपनी बात रखने का उचित अवसर देना कानूनी रूप से जरूरी है। संशोधन प्रक्रिया के दौरान इस अनिवार्यता की अनदेखी नहीं की जा सकती।
अदालत ने निर्वाचन आयोग को यह भी याद दिलाया कि वह एक संवैधानिक संस्था है, जिसकी अहम जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी पात्र नागरिक अपने मताधिकार से वंचित न रहे। कोर्ट के अनुसार, ड्राफ्ट SIR सूची में किसी का नाम शामिल नहीं होना और पहले से दर्ज नाम को हटाना दो अलग-अलग स्थितियां हैं।
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