Last updated: June 24th, 2026 at 05:57 am

बिहार विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच कांग्रेस पार्टी के भीतर मतभेद एक बार फिर खुलकर सामने आ गए हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद अखिलेश प्रसाद सिंह ने पार्टी की चुनावी रणनीति, संगठनात्मक फैसलों और बिहार नेतृत्व पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि जब वे बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष थे, तब पार्टी की स्थिति बेहतर थी, लेकिन उनके हटने के बाद संगठन कमजोर हुआ और चुनावी परिणाम भी प्रभावित हुए। उन्होंने दावा किया कि यदि वे अध्यक्ष बने रहते तो पार्टी की सीटें सीमित नहीं रहतीं।
अखिलेश प्रसाद सिंह ने अप्रत्यक्ष रूप से बिहार कांग्रेस के प्रभारी कृष्णा अल्लावरू और संगठन में हुए बदलावों पर असंतोष जताया। उन्होंने पूर्व एआईसीसी सचिव शाहनवाज आलम का उल्लेख करते हुए कहा कि नेतृत्व परिवर्तन के बाद पार्टी की दिशा और प्रदर्शन दोनों प्रभावित हुए।
उन्होंने कांग्रेस की सामाजिक न्याय आधारित राजनीति पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि “जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” का विचार नया नहीं है, बल्कि यह बिहार की राजनीतिक परंपरा का हिस्सा रहा है। उन्होंने कर्पूरी ठाकुर, जगदेव प्रसाद, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और नीतीश कुमार जैसे नेताओं का उदाहरण देते हुए कहा कि यह विचार पहले से ही राजनीति में मौजूद रहा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने इस मुद्दे को आवश्यकता से अधिक बढ़ाया, जबकि पार्टी को विकास, रोजगार, शिक्षा और आम जनता के मुद्दों पर अधिक ध्यान देना चाहिए था।
उनके इस बयान को बिहार चुनाव से पहले कांग्रेस के भीतर बढ़ते असंतोष और रणनीतिक मतभेद के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी नेतृत्व इस पर क्या प्रतिक्रिया देता है और चुनाव से पहले संगठन में एकता कैसे बनाए रखी जाती है।
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